Inspirational Story In Hindi | इंस्पिरेशनल स्टोरी इन हिंदी

Inspirational Story In Hindi | इंस्पिरेशनल स्टोरी इन हिंदी

Inspirational story in hindi

दोस्तों ये कहानी Inspirational story in hindi | इंस्पिरेशनल स्टोरी इन हिंदी आपको जरुर पढ़ना चाहिए ये एक महिला की कहानी है जो अंत तक संघर्ष करती है ये Inspirational कहानी आपको बहुत अच्छी सीख देने वाली है। तो आप इस कहानी को पढ़िए।।

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Inspirational story in hindi | इंस्पिरेशनल स्टोरी इन हिंदी

Inspirational story in hindi | इंस्पिरेशनल स्टोरी इन हिंदी

"बताओ ना सासु माँ ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी जो अपनी सौत आप खुद ले आयी!"विना ने उत्सुकता से पूछा।

सुमन जी के हाथ रुक गए। थोड़ि सी कमकम्पी उसके हाथों में हुई और उसने फिर खुद को स्थिर कर लिया।

"सुबह से काम पड़ा है वो तो देखना नहीं है और ये फालतू की बातें करनी है तुझे! जा जाकर काम कर।" सुमन जी ने उसे घुड़का और फिर से खुद को व्यस्त दिखाने लगी।

विना मन मसोस के चली गयी। वो बहुत सी ऐसी बातें सुन चुकी थी पर उसकी सास ने कभी मुँह ना खोला। ये एक ऐसा सच था जो पता तो सबको था पर कोई इसे जानता नहीं था।

शाम को गाँव की औरते जब अपने काम से निपट कर एकदूसरे से बातों में लगी थी ,विना भी अपनी सास के पास आ बैठी।

तभी किसी ने कहा -"आज कल की औरतें बड़ी ही बुरी है। अपने पति को हाथ में ना रखो तो पल भर में फंसा लेती है। और अगला भी क्या करे..आखिर है तो मर्द जात ही!!यौवन के जाल से आज तक कौन बच पाया है।"

बाकी औरते भी उसकी हाँ में हाँ मिला रही थी। सुमन जी शांत थी हमेशा की तरह..और विना को ये खामोशी हमेशा खलती थी।

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संध्या समय बीत गया तो सबने अपने -अपने घरों की राह ली।

इस घर में सिर्फ वो तीन रहते थे। विना ,सुमन जी और उनका बेटा नवीन। विना का पति शहर में था और ससुर जी बहुत पहले गुजर गए।

खाना खाने के बाद विना ,सुमन जी के पास आ बैठी ।बातों बातों में फिर से वो ही बात चल पड़ी। पर आज सुमनजी ने ना ही कुछ कहा ना ही उसे घुड़का।

सुमन जी ने शांत भाव से उसे देख के कहा - तू जानना चाहती है कि आखिर मैं खुद ही अपनी सौत क्यों लायी।

विना - हाँ माँ ! आखिर ऐसी क्या वजह थी जो ये हुआ?!!

सुमन - वजह!! एक स्त्री को अपने से समझौता करने के लिए कोई वजह नहीं होती! अक्सर वो अपने परिवार के लिए ,समाज के लिए और अपने पति के लिए झुक जाती है। और एक स्त्री को त्याग और समर्पण की मूर्ति माना जाता है..कोई सवाल करने का हक उसे नहीं अगर बोल भी लिया तो उसे निचले स्तर की मान लिया जाएगा!पर वो अपने आत्मसम्मान के लिए किसी भी रिश्ते को त्याग सकती है ये कोई नहीं जानता!

विना ध्यान से सुमनजी को सुन रही थी शायद पहली बार वो इतना बोली थी। हमेशा शांत रहने वाली सुमन के ह्दय में छुपा वो झख़्म जैसे हरा हो गया..

"कौन अपनी सौत खुद लाता है! कौन अपने पति को दूसरे को सौंपता है बस एक अभागन के सिवा..मैं भी रोयी थी और जब सब मेरी मर्यादा के बाहर गया तो ले आयी उसे!सुनयना नाम था उसका..और नाम के ही जैसी प्रियदर्शनी थी।"सुमन ने आह भरते हुए कहा जिसमे दर्द छिपा था।

विना ने उसके हाथ पे हाथ रखते हुए बोली- क्या हुआ था माँ?!!

सुमन - सुनना चाहती है ना तू ..तो ले सुन मेरी बर्बादी की कहानी...

* * *

बहुत साल पहले..

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"अरे अपने आदमी को बस में नहीं रख सकती तो किस काम की तू! एक औरत होने पे भी थू है तुझपे!मर्द उस कोठेवाली के सामने पड़ा रहता है और तू महारानी के जैसे घर में..शर्म हया तो रही नहीं तुझमें!"सुमन की सास के ये शब्द सुमन के कानों में शिशे के जैसे पिघल रहे थे। मैं एक बार फिर से अपनी किस्मत पे रो पड़ी।

तुझे पता बहु मेरी तो नाम मात्र की शादी हुई थी सुहागन तो कभी बनी ही नहीं मैं! बस सात फेरे और माँग में सिंदूर भर के वो मुझे लाये थे ,और फिर कभी एक नजर देखा तक नहीं।

कहते है अगर प्रेम रोग चढ़ा हो या संन्यासी हो तो कोई भी खूबसूरती विचलित नहीं कर सकती।मेरी काया अब दिन -बे-दिन मरने लगी थी। हाथ कांपने लगे थे सिंदूर लगाने पर। पर वो नहीं चूके उसके दर पे जाने से।

सब ताने देते की मुझमें ही कमी है। अब तो मैं बस एक हाड़-माँस की मूर्ति बन कर रह गयी थी।

समाज का तिरस्कार ,घर के क्लेश इनसब से मेरा आत्मविश्वास भी डगमगाने लगा। और एक दिन जा पहुँची "उसकी" चौखट पे!!

वो उसका कोठा हुआ करता था । बड़ा चर्चित था। कहते है उसने किसी का घर ना उजाड़ा था पर अपनी चौखट पे आने वाले को निराश भी नहीं किया था।

वो सीढ़ियों से उतरते हुए आयी और उसे देख के लगा कि नजरें ठहरने के काबिल थी वो।

सुनयना मुझे देख के पास आई और झुखते हुए पैर छूने लगी। पर तभी मेरे अंदर पतिव्रता नारी जागी और मैंने पैर पीछे कर लिए। शायद वो ये पहले से जानती थी..खड़ी हुई और मुस्कुराते हुए बोली,"ठकुराइन के पैर इस अभागिन की चौखट पे पड़े..ऐसी कौनसी आपदा आन पड़ी!"

सुमन - अभागिन खुद को नहीं..मुझे कहो!

सुनयना- हमारी इतनी औकात कहाँ की एक सुहागन को अभागन कहें।

मैं अट्हास से हँस पड़ी - जिसके मंदिर का भगवान किसी ओर के दर पे माथा टेके तो वो अभागिन नहीं तो और क्या है?!!

सुनयना - यकीन कीजिए ठकुराइन..हमारी ऐसी कोई मनसा नहीं है।

सुमन - जानते है पर जब घर उजड़ चुका तो तुम ही उसे अब बसा लो।

सुनयना कुछ कदम पीछे हट गई - ये आप क्या कह रही हैं!..एक वेश्या को अपने घर की इज़्ज़त बनाना चाहती है।

सुमन - नहीं बस एक "औरत" को अपने बिखरते घर का आधार बनाना चाहती हूँ।

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सुनयना के आँखों से आँशु झर-झर बहने लगे।

उसी दिन मैं सुनयना को घर ले आयी। बड़ी आ-थू हुई। हजार सवाल हुए, सास ने रो रो कर घर सर पर उठा लिया। पर " वो" फिर भी चुप थे। और अब मुझे उनके बोलने की कोई आस ही नहीं थी।

उसी दिन मैंने सुहाग की निशानियों के साथ वो घर छोड़ दिया।सुनयना ने बहुत रोका..पर अपने आत्मसम्मान को जहाँ खोया वहाँ कैसे रह सकती थी मैं। निकल पड़ी उस घर से ..और जिसके रोकने की उम्मीद थी उसने रोका भी नहीं। ढेरों सवाल छोड़ आयी..जिनके जवाब उनके पास नहीं थे और मैं देना नहीं चाहती थी।

साल बीते..मैं अपनी नयी जिंदगी में खुश थी। अधूरी छूट चुकी पढ़ाई को पूरा किया, खाली वक़्त में बच्चियों को पढ़ना और कुछ बनाना सीखा दिया करती थी। अकेली जरूर थी पर अपने आत्मसम्मान के साथ थी।कभी - कभी रोना आता था कि आखिर मैंने कौनसी गलती की जो मुझे दूसरी औरतों के जैसा सुख नहीं मिला। पर सोचती शायद मेरा सुख किसी और कि किस्मत में लिखा था। जिंदगी में खुश थी मैं..

फिर एक दिन मेरे दरवाजे पे दस्तक हुई..! सामने वही खड़े थे जिन्होंने पत्नी बना के अकेला छोड़ दिया था। जी कड़ा किया और पूछा -" क्यों आये अब यँहा..जो चाहिए था दे चुकी हूँ आपको!"

पहली बार वो गिड़गिड़ाए। पता चला कि सुनयना अपने अंतिम दिनों में है और साथ ही माँ बनने वाली है,उसे बार बार याद कर रही है।

और फिर से एक औरत का दिल पसीज गया! मैं उसी वक़्त उनके साथ चल पड़ी।

जब उसे देखा तो लगा उसकी चेहरे की रौनक खो चुकी है ,पर उसकी थोड़ि सी झलक दिखी जब उसने मुझे देखा।

काफी देर तक मैं उसका सर सहलाती रही। धीरे- धीरे वो नींद में सो गई। और एक दिन ऐसा आया जब वो एक दिन के नवीन को मेरे हाथ में दे विदा हो गयी।

उस दिन पूरा गाँव शांत था। जो गमगीन शांति तो नही थी शायद एक "वेश्या" के मरने की शांति थी।

पर मेरे लिए मेरे सामने उसकी लाश नहीं पड़ी थी ऐसा लग रहा था जैसे मैं वहाँ लेटी हूँ। रह रह कर दिल में हुक उठ रही थी।

वो तो कभी आना ही नहीं चाहती थी उसे तो मैं ही यहाँ लायी थी। लेकिन फिर भी उसे एक मर्द की "औरत" का सम्मान नहीं मिला, मिला तो सिर्फ "रखैल" होने का खिताब!!  और मैं जो कहने को तो एक सुहागन औरत थी पर ये सुख मुझे कभी नहीं मिला..मिली तो बस दुनियाँ की बेचारी वाली नजर!

किसी का क्या गया हमने तो सिर्फ अपना खोया। उसे मिलकर भी कुछ ना मिला और में कुछ पा ना सकी।

उनके आँख से आँशु पहली बार निकला। सच बताऊँ ! पहली बार उस से जलन हुई। कि क्या मैं इस आँशु की हकदार नहीं!!!

पर उस से सहानुभूति इतनी थी कि ये भावना छुप गयी। किसी का कुछ नहीं गया ..ना समाज का ना किसी मर्द का। बस हमारा कुछ बचा नहीं।फिर से औरत के समर्पण और त्याग की बातें चली और उसे "दूसरी औरत" का खिताब मिल गया।

उसकी आत्मा जैसे कह रही थी ..की दिदी आपने बहुत कोशिश की मुझे औरत का सम्मान देने की पर इस दुनियाँ को ये मंजूर नहीं!

वो जा चुकी थी!! और साथ ही ले गयी वो अथाह व्यथा जो सिर्फ उसने ही सहन की ,जिसकी भागीदार मैं कभी नहीं बनी।

उसी दिन मैंने नवीन को संभाला और ले आयी सबके तानों और आग्रह के बीच उस दुनियाँ से अपनी दुनियाँ में!!उनके मुँह से पहली बार मेरे लिए बोल फूटे की ना जाओ।

पर एक बार खोयी हुई चीज कहाँ मिलती है!! और वो मुझे खो चुके थे। मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा लेकिन रुकी भी नहीं और ले आयी नवीन को सबसे दूर। किसी में साहस भी नहीं था कि मुझे रोक पाए। आखिर किस हक से रोकते!!

शायद वो ये कमी सह नही पाए और कुछ ही वक़्त बाद वो भी सुनयना के पास ही चले गए। जब सुना तो ज्यादा कुछ तो नहीं बस सुहाग की निशानियाँ उतार दी।

दिल इतना कड़ा हो चुका था कि..रिश्ते उतने मायने नहीं रखते थे। पर जब छोटे से नवीन को देखती तो लगता कि सुनयना ही हँस रही, बोल रही ,चल रही है। उसे सीने से चिपका के रखती जैसे मेरी कीमती चीज हो।

उसे तो शायद मैंने कुछ नहीं दिया पर उस "सौतन" ने मुझे दुनियाभर की खुशी दी। और उसके बदले कुछ लिया भी नहीं।

एक औरत अपनी जिंदगी में किन मंजरों को देखती है हम उसका अहसास तक नहीं कर सकते। भले ही मैं कभी माँ नहीं बनी पर उसने मुझे ये अहसास जीने  का मौका दिया।भले ही ये दुनियां उसे "दूसरी औरत" "रखैल" या "सौतन" बुलाती है पर मेरी नजर में वो सिर्फ एक "औरत" है जो अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करती।

ये एक मर्द की कमी है कि वो एक औरत से सन्तुष्ट नहीं होता। वो तो वेश्या होकर भी पतिव्रता रही।

भले ही लोग कहते है कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है..पर मेरी नजर से देखो तो एक औरत का सबसे बड़ा साथी भी एक औरत ही होती है..अगर वो उसका साथ दे।

* * *

बात बताने के बाद सुमन की आँखों से कुछ आँशु की बूंदे गिर पड़ी। जैसे उसने अभी ही ये सहा था।

विना ने उसे सम्बल दिया तो उसकी आँखों से कुछ बूंदे गिर पड़ी।

सुमन - अब तू बता बहु क्या वो मेरी सौतन थी! जिसने नवीन जैसा बेटा मेरी झोली में डाल दिया।

विना - नहीं माँ!! वो एक औरत थी सही मायनों में एक औरत जिसने अपने लिए किसी और का नहीं छीना।फिर दुनियाँ चाहे कुछ भी सोचे!

सुमन ने उसे प्यार से देखा - तू भी तो एक पत्नी है ,लेकिन मुझे खुशी इस बात की है कि नवीन एक ऐसा मर्द है जिस में एक औरत का दिल धड़कता है।

तभी नवीन की आवाज़ आयी - अरे माँ खाना दो!! जब देखो तब दोनों सास - बहुएं बातों में लगी रहती है।

फिर एक सामुहिक हँसी गूंज उठी।

दूर तलक उस आसमान में ये देख के कोई मुस्कुरा रहा था!!

मैथलीशरण गुप्त की ये पंक्तियां सटीक बैठती है..

"हाय रे अबला जीवन तेरी यही कहानी..
आँचल में दूध और आँखों में पानी!!"
समाप्त।
दीक्षा चौधरी

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