Motivational Story in Hindi | मोटिवेशनल स्टोरी इन हिंदी( वो अटल है)

Motivational Story in Hindi | मोटिवेशनल स्टोरी इन हिंदी( वो अटल है)

Motivational Story in Hindi:

आज मै आपके लिए Motivational Story in Hindi लेकर आया हूं आप इस कहानी को पढ़े और बताएं कि ये कहानी आपको कैसी लगी

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Motivational Story in Hindi | मोटिवेशनल स्टोरी इन हिंदी( वो अटल है)

अभय आज इतने साल बाद अपने गाँव "कटरवन(काल्पनिक)" जा रहा था । सुंदरवन के पास का ये गाँव अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता था । यहाँ के लोग आपस में प्यार से रहना जानते थे। भले ही उतनी सुविधाएँ नहीं थी लेकिन सबके दिल बड़े थे जो एक -दूसरे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे।

अभय कार के बाहर से हल्की बूंदाबादी के बीच अपना सर हिला रहा था। कितना सुखद नजारा था !!

हल्की हल्की बूंदाबांदी, मिटी की खुशबू, आसमान में काली घटाएं और सुंदरी नामक पेड़ से घिरे वन!

सुंदरवन का नाम ही सुंदरी नामक पेड़ की वजह से पड़ा है। लेकिन अभय को ये वन प्रिय है "अटल" की वजह से।

अटल! बड़ा सा बरगद का पेड़। जो इन्ही वनों और कटरवन के पास बहती नदी की दूसरी तरफ है।

शाम होने को आयी थी और अभय कटरवन पहुंच गया।सबने उसका अपने बच्चे की तरह स्वागत किया। पूरे गाँव के घरों की छतें खपरैल की है। क्योंकि यहाँ अक्सर तूफान आते है इसलिए कच्चे मकान ही बनाये गए है,पर वो घर भी इतने सुंदर बनाए गए है कि वहाँ से जाने का मन नहीं करता।

वो अपने घर में गया। लकड़ी का बना ये घर आज भी करीने से सजा है जैसा वो औऱ उसके पापा छोड़ के गए थे। उसकी माँ के द्वारा सजा ये घर वैसे ही सजा देख अभय की आँखों से एक बूंद गिर गयी।

तभी एक लड़की उस घर के मंदिर में पूजा करने लगी तो अभय उसे देखने लगा ..वो चूड़ीदार सूट में थी और उसके काले बाल उसकी पीठ पे लहरा रहे थे । अभय ने उसे पुकारा -" कौन हो तुम?!"

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वो लड़की उसकी तरफ घूमी! और अभय को देख बोली - अभय ..है ना?"

अभय - हाँ पर तुम कौन?

वो लड़की खुश होते हुए बोली - अरे मैं रागिनी!

अभय अभी भी असमंझ में था तो फिर पूछा - कौन रागिनी ?

रागिनी उसके पास आयी और बोली - अरे तुम्हारी चिन्नू ..अब याद आया?!!

अभय दौड़ता हुआ रागिनी के पास आया और उसके हाथों को पकड़ के घुमाने लगा - चिन्नू तू इति बड़ी हो गयी है ना..इसलिए पहचान ही नहीं पा रहा मैं तो तुझे!

रागिनी - तू भी तो इतना बड़ा हो गया है !

अभय और रागिनी अब चारपाई पे बैठ गए।

रागिनी - तेरे जाने के बाद ये घर बहुत सुना- सुना हो गया। चाची तो पहले ही चल बसी और बाबा तेरे साथ चले गए।खैर, तू थका हुआ आया है मैं कुछ खाने को बना देती हूँ।

रागिनी बाल बांधते हुए रसोईघर की तरफ बढ़ गयी और अभय सुस्ताने लगा।

रागिनी ने खाना परोसा तो अभय बोला- अटल कैसा है?!!

रागिनी - वैसा ही जैसा तुम छोड़ के गए थे पर..

अभय - पर क्या?

रागिनी - खेती की जमीन कम पड़ रही है और गाँव की आबादी भी बढ़ रही है इसलिए गाँव के बड़ों ने सोचा है कि उसे काट कर वहाँ खेती लायक समतल जमीन बना ले। आखिर अटल इतना बड़ा तो है कि वहाँ आधा गाँव आ जाये।

अभय उठते हुए तैश में आकर बोला - और मुसीबत में पूरा गाँव उसकी पनहा ले सकता है उसका क्या?! वो कैसे भूल गए कि ये पेड़ हमारे पूर्वजों की देन है और इस जंगल को हम किसी देवता की तरह पूजते है.. और उसे काट दे।

रागिनी कुछ नहीं बोली तो वो जंगल की तरफ जाते हुए बाहर निकल गया।

वो गुस्से में चले जा रहा था और नदी की एक नाव ली और जंगल की तरफ चला गया।

जंगल में पैर रखते ही उसे अटल (बरगद का पेड़) दिख गया। विशाल, लंबी जड़े जमीन को छू रही थी, सूर्य की रोशनी छन- छन के पत्तों से अंदर आ रही थी..सही मायनों में वो अटल था जो इतने वर्षों बाद भी झुखा नहीं था।

अभय आगे बढ़ा और पेड़ को प्यार से छूने लगा ,और फिर बाहों को फैला दिया। ऐसा लग रहा था दो दोस्त सालों से बिछड़ने के बाद मिले हों।

तभी किसी ने उसके कंधे पे हाथ रखा तो वो पीछे मुड़ा। पीछे रागिनी खड़ी थी।

रागिनी - यही सोच रहे हो ना कि कितने साल हो गए उन बातों को जब हम लोग इसी के नीचे इन्ही छोटे जानवरों के साथ खेला करते थे। और बाबा हमें प्यार से बुला कर ले जाते थे।

अभय ने आँखों में आयी नमी को छुपाकर कहा - हाँ! बाबा कहते थे कि ये जंगल ये जानवर ये पक्षी ये पूरी प्रकृति ही हमारी साथी है। जितना हम इनको देते है ये लोग उस से दुगुना लौटाते है। और आज जब हम अपने सवार्थः के लिए इन्हें काटने लगे है तो भी देखो ये चुप है कोई शिकायत नहीं इन्हें हमसे..लेकिन मुझे है!

रागिनी अटल को देखते हुए बोली - इन्हें कोई शिकायत नहीं है.. क्योंकि इन्हें पता है इंसान के सवार्थः का फल, प्रकृति खुद देगी।

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तभी थोड़ि दूर से हाथियों के चिंघाड़ने की आवाज़ आयी । रागिनी और अभय पेड़ो के पीछे छुपते हुए नदी की तरफ चले गए। नदी के दूसरे छोर पे हाथियों का परिवार था जो एक दूसरे को पानी से नहला रहे थे ,पानी पी रहे थे और अपने बच्चों के साथ खेल रहे थे।

रागिनी और अभय काफी देर तक उन्हें प्यार से देखते रहे ,फिर जब वो झुंड प्रस्थान कर गया तो वो दोनों भी अपने चेहरे पे संतोष की मुस्कान लिए वापिस लौटने लगे।जंगल का जीवन मानव के विभत्स विचारों से अनजान आज भी उसी गति से चल रहा है। उन्होंने कभी भी इंसान के जीवन में दखल नहीं किया। लेकिन इंसानों के सवार्थपूर्ण व्यवहार के कारण एक दूसरे की जिंदगी में दखल हुआ।

और इसके परिणाम , प्राकृतिक असंतुलन के रूप में हमारे सामने है!!

अभय और रागिनी वापिस नाव में बैठ कर गाँव में आ गए। जहाँ सब अटल को कल काटने के लिए तैयार थे।

अभय इसके लिए सब से लड़ गया। पर सब अपनी जिद्द पे अड़े रहे। रागिनी भी विवश थी पर उसे अभय के लिए दुःख हो रहा था । अभय हार मानने वालों में से नहीं था लेकिन यहाँ कोई बात मानने को तैयार नहीं था।

अभय ने सोच लिया कि कल सुबह वो इनसब से पहले वहाँ चला जायेगा और अटल को हाथ भी नहीं लगाने देगा।

अब रात गहराने लगी थी। पर आसमान बादलों की गड़गड़ाहट से भरा हुआ था ,बिजली के कड़कने की आवाज़ अब तेज हो चली थी। हवाएं जोर से चल पड़ी थी।

गाँव के सब लोग घरों से बाहर निकले और बाहर के वातावरण को देखने लगे। हवाएं इतनी तेज थी कि सबकी आँखे भी सही ढंग से नहीं खुल रही थी।

अभय बोला - लगता है कोई बड़ा तूफान आने वाला है! जल्दी से बचने का ठिकाना ढूंढना होगा वरना सब तहस- नहस हो जाएगा।

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रागिनी बोली - सही कहा तुमने! इस मौसम में अक्सर तूफान आते है ..पर ये तो बहुत भयंकर है। ऐसे में हम घर छोड़ के कहाँ पे पनाह ले?

अभय और गाँव वाले सोच रहे थे कि अब क्या किया जाए । किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था । तभी अभय के दिमाग में एक ख्याल आया..

अभय -क्यों ना हम सब आज की रात अटल के नीचे पनाह ले!

सब उसे देखने लगे और बोले - पर वो पेड़ है गिर गया तो।

अभय - भूल गए है आप सब की अटल है वो..आज से पहले भी उसने इस से भयंकर तूफानों में हमारे पूर्वजों को अपनी शरण में लिया है ।उसके नीचे हम आराम से ये रात गुजार लेंगे बिना किसी कठिनाई के।

सब ने एक दूसरे से सहमति ली । क्योंकि अब कोई और चारा नही बचा था।

सब लोग अपने घरों से कीमती और जरूरी सामान ले आये और बच्चों को एकसाथ रखा।

अभय गाँव के कुछ नौजवानों के साथ नावों का इंतजाम में लगा था और रागिनी उसकी मदद कर रही थी।

कुछ देर बाद नदी के इस छोर पे नावों को एक साथ बांधा और अभय तैरता हुआ दूसरे छोर पे गया और दूसरे छोर पे फेंकी हुई रस्सी को एक पेड़ के तने से कस कर बांध दिया।
और रागिनी को इशारा कर दिया।

रागिनी सबसे पहले औरतों ,बच्चों और बूढ़े लोगों को उस तरफ भेजने लगी और फिर अंत में वो सब भी इस तरफ आ गए।

तूफान अपना भयँकर रूप ले चुका था और बरसात बहुत मूसलाधार हो रही थी। सब लोग अटल के नीचे आ गए और उसके तने में बने बड़े से कोटर को साफ किया और बच्चों और औरतों को उसमें भेज दिया।

सारे आदमी और अभय के साथ रागिनी पेड़ की टहनियों के आश्रय में बैठ गए।

अटल ऊँचाई पे था इसलिए हवाएँ भी बस छू कर गुजर पा रही थी।

वो लोग साफ - साफ देख रहे थे कि उनके गाँव में तूफान ने क्या हाहाकार मचाया है। पर नुकसान सिर्फ घर की छतों और मकान की दीवारों को हो रहा था । बहुत नुकसान होने से बच गया।

ये तूफान दूसरे दिन भी जारी रहा । पर अटल अपने तक आने वाली हर मुसीबत को झेल कर उन्हें शरण दे रहा था। तूफानी हवाएं अटल का कुछ नहीं बिगाड़ पा रही थी ।वो क्षणभर के लिए हिलता और फिर वापिस शांत हो जाता।

लेकिन जान - माल का कोई नुकसान ना हुआ। दो दिन उसी की पनाह में काटे । तीसरा दिन अब शांत था। तूफान जैसे आकर गुजर गया था लेकिन किसी को छुआ नहीं।

सभी गाँव वालों की आँखों में आँशु थे ..पर ये आँशु खुशी के थे । वो सब अटल के सामने नतमस्तक थे।

वक़्त के साथ भले ही वो थोड़ा कमजोर हुआ हो पर इतना भी नहीं कि अपने अस्तित्व को नकार दे । और आज उसने ये साबित भी किया  कि पेड़ को जितना हम देते है उस से दुगुना लौटाता है । और उसने तो पूरे गाँव की जान लौटा दी।

पूरे गाँव वालो ने उसे काटने का विचार त्याग दिया। और फिर से जंगल की पूजा नित्यवत होने लगी।

अभय एक पेड़ का सहारा लिए सोच रहा था कि..इंसान स्वार्थी हुआ है पर प्रकृति नहीं हुई है। वो इंसान को सबक जरूर सिखाती है पर खुद ही ममतामयी बन कर बचा भी लेती है, ये जंगल ये जीव ये पेड़ हमेशा इंसानों के साथ हमनाम बनकर रहे उन्हें हर कष्ट में अपना सहयोग दिया अब हमारी बारी है इन्हें सरंक्षण देने का।

औरतें अटल की पूजा कर रही थी ,और अभय उसे देख बोला - अब तो खुश हो ना मेरे दोस्त..आखिर तुमने साबित कर ही दिया कि तू अटल है!

बरगद के पेड़ ने जोर से टहनियाँ हिलायी जैसे कि वो अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर रहा हो।

अभय दौड़ता हुआ उसके पास गया और उसकी टहनियों पे चढ़ता हुआ सबसे ऊपर की टहनी पे गया और उसे बाहों में भरते हुए खुशी से चिल्ला दिया - अटल है तू!!!!

समाप्त ।

दीक्षा चौधरी।

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